
आज का कैनवस
- मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए बिना हिरासत 24 घंटे से अधिक होने पर सर्वोच्च न्यायालय ने रिहाई का आदेश दियाGS II
- सर्वोच्च न्यायालय की चिंताओं के बाद केंद्र UGC के समता संबंधी विनियमों पर पुनर्विचार के लिए समिति बनाने पर विचार कर रहा हैGS II
- केंद्र ने निर्दिष्ट विदेशी नागरिकों और पड़ोसी देशों से आने वाले यात्रियों के लिए आव्रजन संबंधी छूटों में संशोधन कियाGS II
- भारत में 2020 से 2025 के बीच चिकित्सा उपकरणों से जुड़ी गंभीर प्रतिकूल घटनाओं की संख्या लगभग तीन गुनी बढ़ीGS II
- भारत ने तपेदिक के उपचार में प्रयुक्त BPaL दवा-संयोजन के पेटेंट आवेदन को अस्वीकार कियाGS II
- नेपाल के प्रधानमंत्री Balendra Shah 22 नवंबर से भारत की अपनी पहली द्विपक्षीय यात्रा की योजना बना रहे हैंGS II
- Jaishankar ने राष्ट्रमंडल साझेदारों से आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने और संपर्कता मजबूत करने का आह्वान कियाGS II
- अमेरिकी मध्यावधि चुनाव परिणामों से अमेरिकी कांग्रेस का स्वरूप बदला; भारत के व्यापार और प्रौद्योगिकी हितों के लिए नए प्रश्न उठेGS II
- लगातार हूती हमलों के बीच सऊदी अरब ने यनबू तेल केंद्र के लिए चेतावनी जारी कीGS II
- विदेशी शेयरों और ऋण प्रतिभूतियों में भारतीयों का विदेशी निवेश FY27 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच सकता हैGS III
- CMFRI ने 2024-25 के दौरान भारत के तटों पर समुद्री स्तनधारियों के तट पर फँसने की 161 घटनाएँ दर्ज कींGS III
- पंजाब में पराली जलाने पर प्रवर्तन कार्रवाई से फसल अवशेष प्रबंधन और वायु प्रदूषण पर बहस फिर तेज हुईGS III
राजव्यवस्था, अधिकार और शासन
मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए बिना हिरासत 24 घंटे से अधिक होने पर सर्वोच्च न्यायालय ने रिहाई का आदेश दिया
संक्षेप में: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संवैधानिक 24 घंटे की समय-सीमा उस क्षण से शुरू होती है, जब व्यक्ति की स्वतंत्रता पहली बार सीमित की जाती है; औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के समय से नहीं।

चर्चा में क्यों
5 नवंबर 2026 को न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan और न्यायमूर्ति Atul S. Chandurkar की सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने मादक पदार्थों की तस्करी के एक मामले में चार अभियुक्तों को रिहा करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने पाया कि हिरासत की संवैधानिक समय-सीमा का उल्लंघन हुआ था। अभियुक्तों को 29 सितंबर 2025 को लगभग दोपहर 2.30 बजे हिरासत में लिया गया था, लेकिन उन्हें 30 सितंबर को अपराह्न 4.45 बजे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। यह निर्णय अनुच्छेद 22(2) के अंतर्गत 24 घंटे की समय-सीमा की गणना में हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच किसी भी कृत्रिम अंतर को अस्वीकार करता है।
अवधारणा: अनुच्छेद 22(2) और मनमानी हिरासत के विरुद्ध सुरक्षा उपाय
संविधान के अनुच्छेद 22(2) के अनुसार, गिरफ्तार किए गए और हिरासत में रखे गए प्रत्येक व्यक्ति को न्यायालय तक पहुँचने के लिए आवश्यक यात्रा समय को छोड़कर, 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य है। इस अवधि से आगे हिरासत जारी रखने के लिए न्यायिक प्राधिकरण की अनुमति आवश्यक है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 58 भी मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना हिरासत में रखने पर प्रतिबंध लगाती है। ये सुरक्षा उपाय अनुच्छेद 21 के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं और जाँच एजेंसियों को गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी का सहारा लेकर न्यायिक जाँच से बचने से रोकते हैं। अनुच्छेद 22 में निवारक निरोध सहित कुछ श्रेणियों के लिए अलग अपवाद भी हैं।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण।
- अनुच्छेद 22(2): आवश्यक यात्रा समय को छोड़कर, 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना।
- धारा 58, BNSS, 2023: मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना 24 घंटे से अधिक हिरासत में रखने पर प्रतिबंध।
- पीठ: न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan और न्यायमूर्ति Atul S. Chandurkar।
मुख्य परीक्षा के लिए विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- वास्तविक स्वतंत्रता: संवैधानिक सुरक्षा उपाय स्वतंत्रता के वास्तविक हनन के क्षण से लागू होते हैं, न कि केवल औपचारिक गिरफ्तारी के कागज़ात पूरे होने पर।
- न्यायिक निगरानी: रिमांड पर विचार करने से पहले मजिस्ट्रेटों को हिरासत में लिए जाने के वास्तविक समय की पुष्टि करनी चाहिए।
- पुलिस की जवाबदेही: औपचारिक गिरफ्तारी से पहले बिना स्पष्टीकरण के किसी व्यक्ति को हिरासत में रखना संवैधानिक संरक्षणों का उल्लंघन हो सकता है।
- विधि का शासन: जाँच संबंधी शक्तियाँ भी लागू कराई जा सकने वाली संवैधानिक सीमाओं के अधीन हैं।
आगे की राह
- हिरासत और गिरफ्तारी के सटीक तथा सत्यापन योग्य अभिलेख बनाए रखें।
- मजिस्ट्रेटों के लिए हिरासत की समय-रेखा और हिरासत की युक्तिसंगतता की स्वतंत्र रूप से जाँच करना अनिवार्य बनाया जाए।
- जाँच अधिकारियों के प्रशिक्षण और जवाबदेही की व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाए।
आपस में जोड़कर समझें: अनुच्छेद 21 + अनुच्छेद 22 + BNSS, 2023 + राज्य की मनमानी कार्रवाई के विरुद्ध न्यायिक संरक्षण।
सर्वोच्च न्यायालय की चिंताओं के बाद केंद्र UGC के समता संबंधी विनियमों पर पुनर्विचार के लिए समिति बनाने पर विचार कर रहा है
संक्षेप में: केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि वह 2026 के उन UGC समता संबंधी विनियमों की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने पर विचार कर रहा है, जिनके क्रियान्वयन पर न्यायालय ने रोक लगाई है।

चर्चा में क्यों
5 नवंबर 2026 को सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि सरकार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 पर पुनर्विचार के लिए एक समिति बनाने पर विचार कर रही है। इन विनियमों को 13 जनवरी को अधिसूचित किया गया था और न्यायालय ने 29 जनवरी को इनके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant के नेतृत्व वाली पीठ ने प्रत्येक विद्यार्थी की सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर चिंताएँ व्यक्त कीं। विवाद के केंद्र में विनियम 3(1)(c) है, जिसमें SC, ST और OBC समुदायों के सदस्यों के संदर्भ में जाति-आधारित भेदभाव को परिभाषित किया गया है।
अवधारणा: उच्च शिक्षा में समानता और भेदभाव-निषेध
अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 कुछ निर्दिष्ट प्रकार के भेदभाव का निषेध करता है, जबकि अनुच्छेद 15(4) और 15(5) शिक्षा में वंचित समूहों के लिए कुछ विशेष प्रावधानों की अनुमति देते हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, UGC अधिनियम, 1956 के अंतर्गत उच्च शिक्षा के मानकों का विनियमन और समन्वय करता है। संस्थागत समता संबंधी व्यवस्थाओं का उद्देश्य भेदभाव रोकना, शिकायतों के निवारण की प्रक्रियाएँ स्थापित करना और उपचार उपलब्ध कराना है। संवैधानिक विवाद का प्रश्न यह है कि क्या विनियामक परिभाषाएँ और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएँ वास्तविक समानता तथा संविधान द्वारा मान्य सुरक्षा उपायों का सम्मान करते हुए प्रभावित व्यक्तियों को पर्याप्त संरक्षण प्रदान करती हैं।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- UGC की स्थापना विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 के अंतर्गत हुई।
- 2026 के समता संबंधी विनियम अधिसूचित: 13 जनवरी 2026।
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक: 29 जनवरी 2026।
- विनियम 3(1)(c) जाति-आधारित भेदभाव से संबंधित है; विनियमों में भेदभाव की एक व्यापक परिभाषा भी दी गई है।
मुख्य परीक्षा के लिए विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- समावेशी संरक्षण: विनियमों को उच्च शिक्षा संस्थानों में सभी प्रकार के भेदभाव से प्रभावी ढंग से निपटना चाहिए।
- वास्तविक समानता: समान व्यवहार का अर्थ यह नहीं है कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के लिए विशिष्ट सुरक्षा उपायों की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
- कानूनी स्पष्टता: परिभाषाएँ संस्थागत शिकायत निवारण तंत्र और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।
- संस्थागत जवाबदेही: संरक्षण की प्रभावशीलता विश्वसनीय शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था, निष्पक्ष जाँच और प्रभावी उपचार पर निर्भर करती है।
आगे की राह
- विद्यार्थियों, शिक्षकों, प्रभावित समुदायों और विधि विशेषज्ञों के साथ पारदर्शी परामर्श किया जाए।
- परिभाषाएँ स्पष्ट की जाएँ और सुलभ तथा निष्पक्ष शिकायत प्रक्रियाएँ सुनिश्चित की जाएँ।
- स्वतंत्र निगरानी, प्रतिशोध से सुरक्षा के उपाय और संस्थागत जवाबदेही मजबूत की जाए।
आपस में जोड़कर समझें: अनुच्छेद 14 और 15 + सामाजिक न्याय + समावेशी शिक्षा + वैधानिक विनियामक निकायों की जवाबदेही।
स्रोत: The Indian Express, “Centre may set up panel to review UGC equity regulations, Supreme Court told”, 6 नवंबर 2026।; UGC विनियम पोर्टल
केंद्र ने निर्दिष्ट विदेशी नागरिकों और पड़ोसी देशों से आने वाले यात्रियों के लिए आव्रजन संबंधी छूटों में संशोधन किया
संक्षेप में: गृह मंत्रालय ने कुछ निर्दिष्ट विदेशी नागरिकों के लिए पासपोर्ट और वीज़ा संबंधी सशर्त छूटों को संशोधित किया है तथा सीमा-पार यात्रा की आवश्यकताओं को स्पष्ट किया है।

चर्चा में क्यों
गृह मंत्रालय ने 4 नवंबर को आव्रजन और विदेशी नागरिक (छूट) (संशोधन) आदेश, 2026 जारी किया, जिसे 5 नवंबर को प्रकाशित किया गया। इसमें निर्दिष्ट विदेशी नागरिकों के लिए सशर्त छूटें दी गई हैं। इनमें वे पाकिस्तानी नागरिक भी शामिल हैं, जिन्होंने 31 दिसंबर 2009 तक भारत में प्रवेश किया था और जिन्हें पासपोर्ट के नवीनीकरण में विशेष कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के छह निर्दिष्ट धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के वे सदस्य भी शामिल हैं, जिन्होंने निर्धारित परिस्थितियों में 31 दिसंबर 2024 तक भारत में प्रवेश किया था। यह संशोधन भारत, नेपाल और भूटान के बीच यात्रा के लिए आवश्यक दस्तावेज़ों से संबंधित प्रावधानों को भी संबोधित करता है।
अवधारणा: आव्रजन और विदेशी नागरिक अधिनियम, 2025
आव्रजन और विदेशी नागरिक अधिनियम, 2025 भारत में विदेशियों के प्रवेश, निवास और प्रस्थान को नियंत्रित करने वाला विधायी ढाँचा प्रदान करता है। इसकी धारा 33 केंद्र सरकार को निर्दिष्ट छूटों के लिए आदेश जारी करने का अधिकार देती है। अलग-अलग श्रेणियों के लिए छूटें अलग हो सकती हैं और निर्धारित पात्रता तथा सुरक्षा संबंधी शर्तों के अधीन रहती हैं। आव्रजन की अनुमति, शरणार्थी संरक्षण और नागरिकता कानूनी दृष्टि से अलग-अलग विषय हैं। पासपोर्ट या वीज़ा से छूट मिलने का अर्थ स्वतः भारतीय नागरिकता मिलना नहीं है। प्रशासनिक नियमों में सीमा सुरक्षा, असुरक्षित परिस्थितियों में रह रहे निवासियों की स्थिति तथा पड़ोसी देशों के साथ सीमा-पार आवागमन के लिए भारत की स्थापित व्यवस्थाओं के बीच संतुलन भी आवश्यक है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- विधि: आव्रजन और विदेशी नागरिक अधिनियम, 2025।
- संबंधित शक्ति: अधिनियम की धारा 33।
- संशोधन: आव्रजन और विदेशी नागरिक (छूट) (संशोधन) आदेश, 2026।
- निर्दिष्ट धार्मिक समुदाय: हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई; ये आदेश में निर्धारित देश, तिथि और पात्रता संबंधी शर्तों के अधीन हैं।
मुख्य परीक्षा के लिए विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- मानवीय संरक्षण: लंबे समय से रह रहे निवासियों और असुरक्षित समुदायों को यात्रा दस्तावेज़ प्राप्त करने में वास्तविक कठिनाइयाँ हो सकती हैं।
- सीमा सुरक्षा: सशर्त छूटों में पहचान सत्यापन और सुरक्षा संबंधी जाँच की गुंजाइश बनी रहती है।
- क्षेत्रीय आवागमन: भारत ने नेपाल और भूटान के साथ सीमा-पार आवागमन की विशेष व्यवस्थाएँ बनाए रखी हैं।
- कानूनी अंतर: आव्रजन संबंधी छूटों को नागरिकता प्रदान किए जाने के समान नहीं समझना चाहिए।
आगे की राह
- पात्रता, पहचान संबंधी आवश्यकताओं और संबंधित अंतिम तिथियों को स्पष्ट करने वाले सुलभ दिशानिर्देश प्रकाशित किए जाएँ।
- आव्रजन और पंजीकरण प्राधिकारियों द्वारा नियमों का एकसमान क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
- उचित सुरक्षा उपाय बनाए रखते हुए पारदर्शी पुनरीक्षण प्रक्रियाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
आपस में जोड़कर समझें: आव्रजन शासन + भारत-नेपाल-भूटान संबंध + मानवीय संरक्षण + नागरिकता कानून।
स्रोत: The Indian Express, “Home Ministry relaxes passport, visa rules for foreign nationals in India”, 6 नवंबर 2026।; आव्रजन और विदेशी नागरिक (छूट) (संशोधन) आदेश, 2026, राजपत्र अधिसूचना दिनांक 5 नवंबर 2026।
स्वास्थ्य और सार्वजनिक नीति
भारत में 2020 से 2025 के बीच चिकित्सा उपकरणों से जुड़ी गंभीर प्रतिकूल घटनाओं की संख्या लगभग तीन गुनी बढ़ी
संक्षेप में: भारतीय भेषज संहिता आयोग के हाल में सार्वजनिक किए गए आँकड़ों के अनुसार, गंभीर प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टें 2020 में 808 से बढ़कर 2025 में 2,176 हो गईं।

चर्चा में क्यों
6 नवंबर 2026 को The Indian Express ने सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत भारतीय भेषज संहिता आयोग (IPC) से प्राप्त आँकड़ों की जानकारी दी। IPC ने छह वर्षों में चिकित्सा उपकरणों से जुड़ी 9,373 गंभीर प्रतिकूल घटनाएँ दर्ज कीं; वार्षिक रिपोर्टों की संख्या 2020 में 808 से बढ़कर 2025 में 2,176 हो गई। केंद्रीय सूचना आयोग के 10 सितंबर के आदेश के बाद ये आँकड़े 27 अक्टूबर को जारी किए गए। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि केवल प्रतिकूल घटना की रिपोर्ट से यह सिद्ध नहीं होता कि रिपोर्ट में वर्णित नुकसान का कारण वही चिकित्सा उपकरण था।
अवधारणा: भारत का मटीरियोविजिलेंस (Materiovigilance) कार्यक्रम (MvPI)
मटीरियोविजिलेंस का अर्थ प्रत्यारोपण उपकरणों, वेंटिलेटरों और नैदानिक उपकरणों जैसे चिकित्सा उपकरणों से संबंधित प्रतिकूल घटनाओं की व्यवस्थित निगरानी, सूचना-संग्रह और मूल्यांकन है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने जुलाई 2015 में भारत का मटीरियोविजिलेंस कार्यक्रम आरंभ किया। भारतीय भेषज संहिता आयोग इसका राष्ट्रीय समन्वय केंद्र है, जबकि केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन भारत में चिकित्सा उपकरणों का राष्ट्रीय विनियामक है। यह कार्यक्रम सुरक्षा मूल्यांकन, जोखिमों की पहचान और विनियामक सिफारिशों में सहायक है। चिकित्सा उपकरणों का विनियमन चिकित्सा उपकरण नियम, 2017 के अंतर्गत जोखिम-आधारित वर्गीकरण प्रणाली के माध्यम से किया जाता है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- IPC मुख्यालय: गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।
- MvPI की शुरुआत: 6 जुलाई 2015; IPC वर्ष 2018 में राष्ट्रीय समन्वय केंद्र बना।
- गंभीर प्रतिकूल घटना संबंधी रिपोर्टें: वर्ष 2020 में 808 और वर्ष 2025 में 2,176।
- वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान IPC को चिकित्सा उपकरणों से संबंधित 14,584 प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्ट मिलीं, जिनमें से 22 मामले आवश्यक कार्रवाई के लिए CDSCO को भेजे गए।
मुख्य परीक्षा विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- रोगी सुरक्षा: बाजार में उपयोग की मंजूरी मिलने के बाद भी उपकरणों की निगरानी जारी रहनी चाहिए, क्योंकि चिकित्सकीय उपयोग के दौरान सुरक्षा संबंधी समस्याएँ सामने आ सकती हैं।
- नियामकीय जवाबदेही: रिपोर्टिंग प्रणालियों में विश्वसनीय जाँच, वर्गीकरण और समयबद्ध सुधारात्मक कार्रवाई आवश्यक है।
- पारदर्शिता: IPC ने कुछ विनिर्माताओं का विवरण रोकने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(d) के अंतर्गत व्यावसायिक गोपनीयता का आधार दिया।
- आँकड़ों की व्याख्या: रिपोर्टों में वृद्धि रिपोर्टिंग के तौर-तरीकों में बदलाव या वास्तविक घटनाओं में वृद्धि को दर्शा सकती है; केवल इन आँकड़ों से यह स्थापित नहीं किया जा सकता कि उपकरणों के कारण होने वाली हानि वास्तव में बढ़ी है।
आगे की राह
- अस्पतालों में घटना-रिपोर्टिंग, घटनाओं की जाँच और चिकित्सा उपकरणों की पहचान एवं उनकी आपूर्ति-श्रृंखला का पता लगाने की व्यवस्था को सुदृढ़ करें।
- उचित रूप से पहचान-रहित किए गए सुरक्षा आँकड़े और नियामकीय कार्रवाई के परिणाम प्रकाशित करें।
- अस्पतालों, विनिर्माताओं, IPC और CDSCO के बीच समन्वय बेहतर बनाएँ।
विभिन्न पहलुओं को जोड़ें: GS II में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन + GS III में चिकित्सा प्रौद्योगिकी + सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत पारदर्शिता।
स्रोत: The Indian Express, “Nearly 3-fold jump in serious adverse events caused by medical devices: New data”, 6 नवंबर 2026।; IPC, भारत का मटीरियोविजिलेंस कार्यक्रम (Materiovigilance Programme of India)
भारत ने तपेदिक के उपचार में प्रयुक्त BPaL दवा-संयोजन के पेटेंट आवेदन को अस्वीकार किया
संक्षेप में: BPaL दवा-संयोजन के पेटेंट आवेदन को अस्वीकार किए जाने से दवा-प्रतिरोधी तपेदिक की दवाओं के बाजार में प्रतिस्पर्धा की एक संभावित बाधा दूर हुई है।

समाचार में क्यों
भारतीय पेटेंट कार्यालय ने बेडाक्विलिन, प्रीटोमैनिड और लिनेज़ोलिड के संयोजन, जिसे BPaL कहा जाता है, के लिए पेटेंट संरक्षण माँगने वाले TB Alliance के आवेदन को अस्वीकार कर दिया। The Indian Express ने 5 नवंबर 2026 को इस निर्णय की व्याख्या की। वर्ष 2020 में इस आवेदन के विरुद्ध पेटेंट दिए जाने से पहले दो आपत्तियाँ दर्ज की गई थीं। BPaL दवा-प्रतिरोधी तपेदिक के पात्र रोगियों के लिए छह महीने की, पूरी तरह मुँह से ली जाने वाली दवाओं पर आधारित उपचार-पद्धति है। इस निर्णय से अधिक प्रतिस्पर्धा संभव हो सकती है, लेकिन दवाओं की कीमतें घटने की गारंटी नहीं है। वर्ष 2024 में भारत में तपेदिक की घटनादर प्रति 1,00,000 जनसंख्या पर 187 थी।
अवधारणा: पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 3(d)
धारा 3(d) किसी ज्ञात पदार्थ के नए रूप की पेटेंट-योग्यता को सीमित करती है, जब तक कि उससे उस पदार्थ की ज्ञात प्रभावकारिता में वृद्धि प्रदर्शित न हो। यह प्रावधान ज्ञात पदार्थों के नए गुणों या उपयोगों की मात्र खोज से भी संबंधित है। औषधीय पेटेंटों के ‘एवरग्रीनिंग’ संबंधी विमर्श में यह प्रावधान महत्त्वपूर्ण है; एवरग्रीनिंग में पर्याप्त नवाचार के बिना अतिरिक्त पेटेंट लेकर बाजार में विशिष्ट अधिकार की अवधि बढ़ाई जा सकती है। अलग से, धारा 25(1) पेटेंट आवेदन पर पेटेंट दिए जाने से पहले आपत्ति करने की अनुमति देती है। पेटेंट कानून का उद्देश्य वास्तविक नवाचार और जनता की दवाओं तक पहुँच के बीच संतुलन बनाना है। धारा 3(d) प्रासंगिक पृष्ठभूमि अवश्य है, लेकिन इस आवेदन को अस्वीकार करने के विशिष्ट कानूनी आधार के रूप में इसके उपयोग की पुष्टि नहीं हुई थी।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- BPaL: बेडाक्विलिन + प्रीटोमैनिड + लिनेज़ोलिड।
- BPaLM: BPaL संयोजन के साथ मोक्सीफ्लोक्सासिन।
- BPaL पात्र दवा-प्रतिरोधी तपेदिक रोगियों के लिए छह महीने की, पूरी तरह मौखिक दवाओं पर आधारित उपचार-पद्धति है।
- धारा 3(d): पेटेंट-योग्यता पर प्रतिबंध; धारा 25(1): पेटेंट प्रदान किए जाने से पूर्व आपत्ति।
मुख्य परीक्षा विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- दवाओं तक पहुँच: पेटेंट आवेदन अस्वीकार होने से अन्य औषधि विनिर्माताओं के बाजार में प्रवेश को सुविधा मिल सकती है।
- नवाचार में संतुलन: पेटेंट परीक्षण में वास्तविक प्रगति को मान्यता मिलनी चाहिए, लेकिन अनुचित विशिष्ट अधिकार की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
- सार्वजनिक खरीद: प्रतिस्पर्धा से दवाएँ अधिक किफायती हो सकती हैं, लेकिन उनकी उपलब्धता सार्वजनिक खरीद और गुणवत्ता आश्वासन पर भी निर्भर करती है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ: दवाओं की उपलब्धता के साथ समय पर निदान, उपचार की शुरुआत और उपचार का नियमित पालन सुनिश्चित करने हेतु सहायता भी आवश्यक है।
आगे की राह
- दवाओं के कठोर मानकों को बनाए रखते हुए गुणवत्ता-आश्वासित प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहन दें।
- सार्वजनिक खरीद, आपूर्ति-श्रृंखला की विश्वसनीयता और रोगियों की दवाओं तक पहुँच में सुधार करें।
- राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत शीघ्र पहचान और निर्बाध उपचार का विस्तार करें।
विभिन्न पहलुओं को जोड़ें: पेटेंट अधिनियम + दवाओं तक पहुँच + सार्वजनिक स्वास्थ्य + दवा-प्रतिरोधी तपेदिक + SDG 3।
स्रोत: The Indian Express, “Explained: Why India’s rejection of a TB drug patent matters for patients”, 5 नवंबर 2026।; India Code, पेटेंट अधिनियम, 1970
अंतरराष्ट्रीय संबंध
नेपाल के प्रधानमंत्री Balendra Shah की 22 नवंबर से पहली द्विपक्षीय भारत यात्रा की योजना
संक्षेप में: नेपाल के प्रधानमंत्री Balendra Shah की 22 नवंबर 2026 से भारत की तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा निर्धारित है।

समाचार में क्यों
6 नवंबर 2026 को The Indian Express ने बताया कि नेपाल के प्रधानमंत्री Balendra Shah 22 नवंबर से तीन दिनों के लिए भारत आएँगे। मार्च में पदभार ग्रहण करने के बाद यह उनकी पहली द्विपक्षीय यात्रा होगी। यह घटनाक्रम 5 नवंबर को काठमांडू में भारतीय विदेश सचिव Vikram Misri के साथ उनकी बैठक के बाद सामने आया। दोनों पक्षों ने जल संसाधन, ऊर्जा, व्यापार, पारगमन और विमानन में द्विपक्षीय सहयोग पर चर्चा की। Shah ने अगस्त 2026 में नेपाल को प्रभावित करने वाली विनाशकारी आकस्मिक बाढ़ के दौरान भारत की प्रतिक्रिया का भी उल्लेख किया।
अवधारणा: भारत-नेपाल द्विपक्षीय संबंध
भारत और नेपाल के बीच घनिष्ठ संबंध हैं, जो भौगोलिक निकटता, ऐतिहासिक जुड़ाव, लोगों के बीच आवागमन और आर्थिक परस्पर निर्भरता से निर्मित हुए हैं। वर्ष 1950 की शांति और मैत्री संधि द्विपक्षीय ढाँचे का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। सहयोग के क्षेत्रों में सीमापार अवसंरचना, विद्युत व्यापार, पारगमन सुविधाएँ, आपदा प्रबंधन और जल संसाधन शामिल हैं। नेपाल की स्थलरुद्ध भौगोलिक स्थिति के कारण परिवहन संपर्क और समुद्री बंदरगाहों तक पहुँच विशेष महत्त्व रखती है। हिमालयी नदी प्रणालियाँ जलविद्युत के अवसर देने के साथ बाढ़ और जल प्रबंधन संबंधी चुनौतियाँ भी उत्पन्न करती हैं। ये संबंध भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- नेपाल की राजधानी: काठमांडू।
- प्रधानमंत्री: Balendra Shah, जिन्होंने मार्च 2026 में पदभार ग्रहण किया।
- प्रस्तावित भारत यात्रा: 22–24 नवंबर 2026।
- महत्त्वपूर्ण द्विपक्षीय संधि: भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि, 1950।
मुख्य परीक्षा विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- ऊर्जा सहयोग: जलविद्युत और बिजली का व्यापार आर्थिक परस्पर निर्भरता को बढ़ा सकते हैं।
- संपर्क-सुविधाएँ: व्यापार और पारगमन संबंधी व्यवस्थाएँ स्थलरुद्ध नेपाल के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
- जल प्रबंधन: साझा नदी प्रणालियों के संदर्भ में बाढ़, सिंचाई और जलविद्युत के लिए समन्वय आवश्यक है।
- क्षेत्रीय कूटनीति: सतत संवाद से हिमालयी पड़ोस में स्थिरता और पारस्परिक विश्वास को बल मिलता है।
आगे की राह
- संपर्क और ऊर्जा से संबंधित मौजूदा प्रतिबद्धताओं को लागू करने को प्राथमिकता दें।
- पूर्व चेतावनी प्रणालियों और हिमालयी आपदा जोखिमों पर सहयोग को सुदृढ़ करें।
- संप्रभुता का सम्मान करते हुए व्यावहारिक विकास प्राथमिकताओं पर केंद्रित संवाद को बढ़ावा दें।
विभिन्न पहलुओं को जोड़ें: पड़ोसी प्रथम नीति + हिमालयी भूगोल + जलविद्युत + क्षेत्रीय संपर्क + आपदा प्रबंधन।
Jaishankar ने कॉमनवेल्थ साझेदारों से आपूर्ति-श्रृंखलाओं में विविधता लाने और संपर्क-सुविधाएँ सुदृढ़ करने का आग्रह किया
संक्षेप में: विदेश मंत्री S. Jaishankar ने कॉमनवेल्थ सदस्य देशों के बीच विश्वसनीय आपूर्ति-श्रृंखलाओं, बेहतर संपर्क और क्षमता निर्माण में अधिक सहयोग का आह्वान किया।

समाचार में क्यों
विदेश मंत्री S. Jaishankar ने 4 नवंबर 2026 को St John’s, Antigua and Barbuda में कॉमनवेल्थ शासनाध्यक्षों और व्यापार जगत के प्रतिनिधियों की बैठक को संबोधित किया। उन्होंने साझेदार देशों से विविधीकरण, छोटी और विश्वसनीय आपूर्ति व्यवस्थाओं तथा स्थानीय वितरण को सुदृढ़ करके आपूर्ति-श्रृंखला संबंधी जोखिम घटाने का आग्रह किया। उन्होंने डिजिटल प्रौद्योगिकी, कौशल-संपन्न कर्मियों की आवाजाही और क्षमता निर्माण पर भी बल दिया। जलवायु कार्रवाई के लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और आपदा-रोधी अवसंरचना के लिए गठबंधन को सहयोग के संभावित मंच बताया। कॉमनवेल्थ में वर्तमान में 56 स्वतंत्र देश शामिल हैं।
अवधारणा: राष्ट्रमंडल और आपूर्ति-श्रृंखला का लचीलापन
कॉमनवेल्थ (राष्ट्रमंडल) 56 स्वतंत्र और समान सदस्य देशों का स्वैच्छिक संघ है। इसका आधुनिक स्वरूप वर्ष 1949 की लंदन घोषणा के माध्यम से उभरा। सदस्य देश विकास, शासन, लोकतंत्र और अन्य साझा प्राथमिकताओं पर सहयोग करते हैं। आर्थिक कूटनीति में जोखिम कम करने (डी-रिस्किंग) का अर्थ है चुनिंदा आपूर्तिकर्ताओं, बाजारों या परिवहन मार्गों पर अत्यधिक निर्भरता से उत्पन्न व्यवधानों के प्रति संवेदनशीलता घटाना। विविधीकरण में उत्पादन और आपूर्ति के स्रोतों को कई विश्वसनीय साझेदारों में बाँटा जाता है। इसका अर्थ किसी मौजूदा साझेदार के साथ व्यापार समाप्त करना आवश्यक नहीं है। संपर्क अवसंरचना, पारदर्शी नियम, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और विश्वसनीय साझेदारियाँ अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति-श्रृंखलाओं के लचीलेपन के लिए केंद्रीय महत्त्व रखती हैं।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- कॉमनवेल्थ की सदस्यता: 56 देश।
- आधुनिक कॉमनवेल्थ: लंदन घोषणा, 1949 से संबंधित।
- कॉमनवेल्थ शासनाध्यक्ष बैठक 2026: St John’s, Antigua and Barbuda।
- ISA: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन; CDRI: आपदा-रोधी अवसंरचना के लिए गठबंधन।
मुख्य परीक्षा विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- आर्थिक सुरक्षा: कुछ ही स्रोतों पर केंद्रित आपूर्ति-श्रृंखलाएँ भू-राजनीतिक या लॉजिस्टिक्स संबंधी व्यवधानों के समय जोखिम बढ़ाती हैं।
- दक्षिण-दक्षिण सहयोग: कॉमनवेल्थ की साझेदारियाँ व्यापार, क्षमता निर्माण और विकास के अवसर देती हैं।
- डिजिटल शासन: डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ प्रशासनिक दक्षता और सीमापार व्यावसायिक सहयोग बढ़ा सकती हैं।
- जलवायु अनुकूलन क्षमता: छोटे द्वीपीय और संवेदनशील सदस्य देशों में जलवायु अनुकूलन तथा आपदा प्रबंधन की उल्लेखनीय आवश्यकता है।
आगे की राह
- अनावश्यक व्यापार अवरोध उत्पन्न किए बिना विविध आपूर्तिकर्ता नेटवर्क को बढ़ावा दें।
- परिवहन संपर्क, लॉजिस्टिक्स और कौशल संबंधी साझेदारियों में निवेश करें।
- संवेदनशील सदस्य देशों की सहायता के लिए ISA, CDRI और आपदा प्रतिक्रिया संबंधी सहयोग का उपयोग करें।
विभिन्न पहलुओं को जोड़ें: कॉमनवेल्थ कूटनीति + लचीली आपूर्ति-श्रृंखलाएँ + वैश्वीकरण + जलवायु सहयोग + भारत के बाह्य आर्थिक संबंध।
स्रोत: Akashvani News, “EAM urges Commonwealth nations to diversify supply chains, strengthen connectivity”, 5 नवंबर 2026।; कॉमनवेल्थ सचिवालय
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव परिणामों से कांग्रेस का स्वरूप बदला; भारत के व्यापार और प्रौद्योगिकी हितों को लेकर प्रश्न उठे
संक्षेप में: अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत विधायी प्राथमिकताओं और निगरानी को प्रभावित कर सकती है, जिसके भारत के व्यापार, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा हितों पर संभावित प्रभाव हो सकते हैं।

समाचार में क्यों
अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को मध्यावधि चुनाव हुए। The Indian Express ने 5 नवंबर को बताया कि डेमोक्रेटिक पार्टी ने कांग्रेस के दोनों सदनों पर पुनः नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस राजनीतिक परिवर्तन से राष्ट्रपति Donald Trump के विधायी एजेंडे पर प्रभाव पड़ सकता है और प्रशासन पर कांग्रेस की निगरानी बढ़ सकती है। रिपोर्ट में कृत्रिम बुद्धिमत्ता में निवेश, प्रशुल्क, आव्रजन और तेल बाजारों पर संभावित प्रभावों की पड़ताल की गई। ये प्रभाव अभी संभावित परिदृश्य हैं, लागू हो चुके नीतिगत परिवर्तन नहीं। 5 नवंबर को भारत के सेंसेक्स और निफ्टी अपने पिछले बंद स्तरों की तुलना में क्रमशः 2.17% और 1.74% ऊपर खुले।
अवधारणा: अमेरिकी मध्यावधि चुनाव और शक्तियों का पृथक्करण
संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति प्रणाली है, जिसमें कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अलग-अलग शाखाएँ हैं। कांग्रेस में प्रतिनिधि सभा और सीनेट शामिल हैं। प्रतिनिधि सभा की सभी 435 मतदान-अधिकार वाली सीटों पर प्रत्येक दो वर्ष में चुनाव होता है, जबकि प्रत्येक नियमित चुनाव चक्र में सीनेट की 100 सीटों में से लगभग एक-तिहाई पर चुनाव होता है। मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति के चार वर्षीय कार्यकाल के मध्य में होते हैं। कांग्रेस विधायी, बजटीय और निगरानी संबंधी शक्तियों का प्रयोग करती है। कांग्रेस में बहुमत बदलने से विधायी वार्ताओं, समितियों के नेतृत्व और कार्यपालिका के निर्णयों की जाँच पर प्रभाव पड़ सकता है, हालाँकि इससे मौजूदा प्रशुल्क या विदेश नीतियाँ स्वतः नहीं बदलतीं।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- अमेरिकी कांग्रेस: प्रतिनिधि सभा और सीनेट।
- मतदान-अधिकार वाले सदस्यों की संख्या: प्रतिनिधि सभा, 435; सीनेट, 100।
- प्रतिनिधि सभा का कार्यकाल: दो वर्ष; सीनेट का कार्यकाल: छह वर्ष।
- अमेरिकी मध्यावधि चुनाव की तिथि: 3 नवंबर 2026।
मुख्य परीक्षा विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- व्यापार: कांग्रेस का दबाव और चुनावी प्राथमिकताएँ भविष्य की अमेरिकी प्रशुल्क वार्ताओं को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन परिणाम अनिश्चित हैं।
- प्रौद्योगिकी: AI से संबंधित कानूनों, निवेश और आव्रजन नियमों में बदलाव भारतीय प्रौद्योगिकी व्यवसायों को प्रभावित कर सकते हैं।
- ऊर्जा: ईरान और रूस के प्रति अमेरिकी नीति कच्चे तेल की कीमतों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए प्रासंगिक बनी हुई है।
- रणनीतिक संबंध: भारत-अमेरिका सहयोग केवल अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न राजनीतिक दलों और संस्थाओं तक विस्तृत है।
आगे की राह
- अमेरिकी प्रशासन, कांग्रेस, राज्यों और व्यावसायिक हितधारकों के साथ संवाद बनाए रखें।
- निर्यात बाजारों में विविधता लाएँ और घरेलू प्रौद्योगिकी क्षमताओं में सुधार करें।
- राजनीतिक पूर्वानुमानों को लागू नीति मानने के बजाय औपचारिक विधायी और प्रशासनिक निर्णयों पर नज़र रखें।
विभिन्न पहलुओं को जोड़ें: अमेरिकी राजनीतिक संस्थाएँ + भारत-अमेरिका व्यापार + कृत्रिम बुद्धिमत्ता + कुशल श्रमिकों का प्रवासन + ऊर्जा सुरक्षा।
हूती हमलों के जारी रहने के बीच सऊदी अरब ने Yanbu तेल केंद्र के लिए चेतावनी जारी की
संक्षेप में: क्षेत्र में हमले जारी रहने के बीच सऊदी अरब ने Yanbu में संभावित खतरे की चेतावनी दी, जिससे लाल सागर की अवसंरचना और नौवहन के जोखिम सामने आए हैं।

समाचार में क्यों
यमन के हूती समूह से जुड़े हमलों के जारी रहने के बीच सऊदी अरब ने 5 नवंबर 2026 को अपने लाल सागर तट पर स्थित प्रमुख तेल-निर्यात केंद्र Yanbu में संभावित खतरे की चेतावनी जारी की। Reuters ने बताया कि सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने मदीना की ओर बढ़ रही एक मिसाइल को बीच में ही रोक दिया और यमन की सीमा के निकट स्थित Sharurah के लिए आपातकालीन चेतावनियाँ जारी की गईं। रिपोर्ट प्रकाशित होने तक हूती समूह ने गुरुवार को हुए एक हमले की जिम्मेदारी नहीं ली थी। Yanbu के लिए जारी चेतावनी को इस बात की पुष्टि नहीं माना जाना चाहिए कि वहाँ की तेल सुविधाओं पर हमला हुआ था।
अवधारणा: बाब-अल-मंदेब, लाल सागर का नौवहन और ऊर्जा सुरक्षा
बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से और उसके माध्यम से अरब सागर से जोड़ता है। स्वेज नहर लाल सागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है और एशिया तथा यूरोप के बीच एक महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्ग बनाती है। इस गलियारे में व्यवधान से वाणिज्यिक नौवहन, बीमा, माल-भाड़ा लागत और माल पहुँचने की समय-सारिणी प्रभावित हो सकती है। Yanbu सऊदी अरब के लाल सागर तट पर स्थित एक तेल-निर्यात केंद्र है। भारत के लिए पश्चिम एशिया में समुद्री सुरक्षा महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि आयातित ऊर्जा, नौवहन मार्ग और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करते हैं।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- Yanbu: सऊदी अरब के लाल सागर तट पर स्थित तेल-निर्यात केंद्र।
- बाब-अल-मंदेब: लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ता है।
- स्वेज नहर: भूमध्य सागर और लाल सागर को जोड़ती है।
- हूती: यमन में सक्रिय सशस्त्र आंदोलन।
मुख्य परीक्षा विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- ऊर्जा सुरक्षा: तेल अवसंरचना को खतरे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा सकते हैं।
- नौवहन सुरक्षा: लाल सागर गलियारे के जोखिम वाणिज्यिक मार्गों के चयन और समुद्री लॉजिस्टिक्स को प्रभावित कर सकते हैं।
- क्षेत्रीय अस्थिरता: यमन और सऊदी अरब से जुड़े संघर्ष के व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव हैं।
- भारतीय हित: व्यापार प्रवाह, ऊर्जा आयात और समुद्री संपर्क के कारण क्षेत्रीय स्थिरता में भारत की महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी है।
आगे की राह
- कच्चे तेल की आपूर्ति के स्रोतों में विविधता और उपयुक्त रणनीतिक भंडार बनाए रखें।
- वाणिज्यिक नौवहन के लिए समुद्री परिस्थितियों की जानकारी तथा समन्वय को सुदृढ़ करें।
- तनाव बढ़ने से रोकने और नागरिक समुद्री अवसंरचना की रक्षा के लिए कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन करें।
विभिन्न पहलुओं को जोड़ें: पश्चिम एशिया की भू-राजनीति + बाब-अल-मंदेब + स्वेज नहर + समुद्री सुरक्षा + ऊर्जा आयात पर भारत की निर्भरता।
अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और कृषि
विदेशी शेयरों और ऋण प्रतिभूतियों में भारतीयों का विदेशों में निवेश FY27 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच सकता है
संक्षेप में: RBI के आँकड़े उदारीकृत प्रेषण योजना के माध्यम से निवासी व्यक्तियों द्वारा विदेशों में इक्विटी और ऋण प्रतिभूतियों में निवेश में तीव्र वृद्धि दर्शाते हैं।

समाचार में क्यों
The Indian Express ने 6 नवंबर 2026 को बताया कि भारतीय रिज़र्व बैंक की उदारीकृत प्रेषण योजना के अंतर्गत विदेशों में इक्विटी और ऋण प्रतिभूतियों में निवेश अप्रैल–अगस्त 2026 के दौरान 1.73 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। यह वर्ष 2025 की समान अवधि में दर्ज 82.3 करोड़ अमेरिकी डॉलर ($823 million) के दोगुने से भी अधिक था। पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में ऐसा निवेश 2.65 अरब अमेरिकी डॉलर रहा था। यदि वर्तमान गति बनी रहती है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में यह पहली बार 4 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो सकता है। 4 अरब अमेरिकी डॉलर का आँकड़ा एक अनुमान है, न कि पूर्ण वित्त वर्ष का वास्तविक कुल निवेश।
अवधारणा: उदारीकृत प्रेषण योजना और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश
RBI द्वारा फरवरी 2004 में शुरू की गई उदारीकृत प्रेषण योजना (LRS), निवासी व्यक्तियों को अनुमत लेनदेन के लिए विदेश में विदेशी मुद्रा भेजने की सुविधा देती है। लागू RBI ढाँचे के अनुसार प्रति निवासी व्यक्ति वार्षिक सीमा USD 250,000 है, जिसमें पात्र चालू खाता और पूँजी खाता लेनदेन संयुक्त रूप से शामिल हैं। अनुमत पूँजी खाता लेनदेन में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश भी शामिल हो सकता है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का सामान्य अर्थ विदेशी प्रतिभूतियों में ऐसा निवेश है जिसमें प्रत्यक्ष निवेश या नियंत्रण की विशेषताएँ नहीं होतीं। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का नियामकीय वर्गीकरण अलग होता है। विदेशों में निवेश से वित्तीय जोखिमों का विविधीकरण संभव है, लेकिन इसमें मुद्रा, बाजार और नियामकीय जोखिम भी होते हैं।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- LRS की शुरुआत: 4 फरवरी 2004।
- LRS की वार्षिक सीमा: प्रति निवासी व्यक्ति USD 250,000।
- LRS के माध्यम से विदेशी इक्विटी और ऋण प्रतिभूतियों में निवेश, अप्रैल–अगस्त 2026: 1.73 अरब अमेरिकी डॉलर।
- अप्रैल–अगस्त 2025 की समान अवधि में राशि: 82.3 करोड़ अमेरिकी डॉलर ($823 million)।
मुख्य परीक्षा विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- पोर्टफोलियो विविधीकरण: विदेशी प्रतिभूतियाँ निवेशकों को घरेलू वित्तीय बाजारों से परे निवेश में विविधता लाने का अवसर देती हैं।
- बाह्य क्षेत्र पर प्रभाव: विदेशों में प्रेषण बढ़ने से विदेशी मुद्रा का बहिर्प्रवाह बढ़ता है।
- विनिमय-दर जोखिम: विदेशों से मिलने वाला प्रतिफल परिसंपत्तियों के प्रदर्शन और विनिमय दरों में बदलाव, दोनों से प्रभावित होता है।
- वित्तीय विनियमन: बाह्य पूँजी प्रवाह के विश्लेषण में पोर्टफोलियो निवेश और प्रत्यक्ष निवेश के बीच अंतर करना आवश्यक है।
आगे की राह
- मुद्रा, कराधान और बाजार जोखिमों के संबंध में निवेशकों की जागरूकता बढ़ाएँ।
- सीमापार निवेश सेवाओं में जानकारी के प्रकटीकरण और पारदर्शिता में सुधार करें।
- FEMA के अंतर्गत पूर्वानुमेय नियामकीय ढाँचा बनाए रखते हुए समग्र पूँजी प्रवाह की निगरानी करें।
विभिन्न पहलुओं को जोड़ें: RBI + FEMA, 1999 + पूँजी खाता + विनिमय दरें + पोर्टफोलियो विविधीकरण + भुगतान संतुलन।
स्रोत: The Indian Express, “Why Indians are investing billions abroad amid shaky domestic stock markets”, 6 नवंबर 2026।; RBI, उदारीकृत प्रेषण योजना पर मास्टर निदेश
CMFRI ने 2024-25 के दौरान भारत के तट पर समुद्री स्तनधारियों के तट पर फँसने की 161 घटनाएँ दर्ज कीं
संक्षेप में: CMFRI के एक अध्ययन में समुद्री स्तनधारियों के तट पर फँसने की घटनाओं के तटीय प्रतिरूपों की पहचान की गई है तथा संरक्षण एवं निगरानी में सहायता के लिए GIS मंच विकसित किया गया है।

समाचार में क्यों
5 नवंबर 2026 को ICAR-केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान ने बताया कि उसने वर्ष 2024-25 के दौरान भारतीय तट पर समुद्री स्तनधारियों के तट पर फँसने की 161 घटनाएँ दर्ज कीं। गोवा में सर्वाधिक 113 मामले दर्ज हुए, जिसके बाद केरल में 13 और महाराष्ट्र में 11 मामले थे। अध्ययन में हम्पबैक डॉल्फ़िन के तट पर फँसने की 82 और इंडो-पैसिफिक फिनलेस पोरपॉइज़ की 44 घटनाएँ दर्ज की गईं। CMFRI ने 32 समुद्री स्तनधारी प्रजातियों से संबंधित लगभग 1,300 भौगोलिक अभिलेखों को एकीकृत करके एक इंटरैक्टिव GIS मंच भी विकसित किया। ये निष्कर्ष कोच्चि में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए गए।
अवधारणा: समुद्री स्तनधारियों का तट पर फँसना और CMFRI की भूमिका
समुद्री स्तनधारी के तट पर फँसने (स्ट्रैंडिंग) की घटना तब होती है, जब डॉल्फ़िन, व्हेल या पोरपॉइज़ जैसा जीव तट पर फँस जाता है या समुद्र तट के किनारे मृत पाया जाता है। ऐसी घटनाओं के विभिन्न कारण हो सकते हैं, जिनमें बीमारी, जाल में उलझना, टक्कर लगना और पर्यावरणीय व्यवधान शामिल हैं। कारण स्थापित करने से पहले प्रत्येक मामले की जाँच आवश्यक है। कोच्चि स्थित केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत कार्य करता है और समुद्री मत्स्य संसाधनों तथा उनसे जुड़े पारितंत्रों पर अनुसंधान करता है। तट पर फँसने की घटनाओं की निगरानी करने वाले नेटवर्क, प्रजातियों की पहचान और भौगोलिक सूचना प्रणालियाँ घटनाओं का दस्तावेजीकरण करने, प्रतिरूप पहचानने तथा संरक्षण संबंधी कार्रवाई का मार्गदर्शन करने में सहायता करती हैं।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- ICAR-CMFRI का मुख्यालय: कोच्चि, केरल।
- 2024-25 में दर्ज समुद्री स्तनधारियों के तट पर फँसने की घटनाएँ: 161।
- राज्यवार सर्वाधिक दर्ज संख्या: गोवा, 113।
- दर्ज प्रजातियाँ: हम्पबैक डॉल्फ़िन (Sousa plumbea), 82 मामले; इंडो-पैसिफिक फिनलेस पोरपॉइज़ (Neophocaena phocaenoides), 44 मामले।
मुख्य परीक्षा विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- जैवविविधता की निगरानी: तट पर फँसने की घटनाओं के अभिलेख समुद्री स्तनधारियों के वितरण और संभावित खतरों की जानकारी देते हैं।
- वैज्ञानिक अनिश्चितता: केवल तट पर फँसने की घटनाओं की संख्या से उनके कारण या समग्र आबादी के रुझान निर्धारित नहीं किए जा सकते।
- भौगोलिक निगरानी: GIS आधारित अभिलेख जाँच के लिए प्राथमिकता वाले स्थानों की पहचान में सहायक हो सकते हैं।
- संस्थागत समन्वय: शोधकर्ता, तटीय प्राधिकरण, मछुआरे और प्रशिक्षित स्वयंसेवक घटनाओं की सूचना देने एवं प्रतिक्रिया कार्रवाई में योगदान देते हैं।
आगे की राह
- तटीय घटनाओं की सूचना देने वाले नेटवर्क और त्वरित प्रतिक्रिया दलों को सुदृढ़ करें।
- शव-परीक्षण के निष्कर्षों, प्रजाति की पहचान, क्षेत्रीय जाँच और स्थानिक आँकड़ों को एक साथ उपयोग में लाएँ।
- मत्स्य विभागों, संरक्षण एजेंसियों और तटीय समुदायों के बीच समन्वय बेहतर बनाएँ।
विभिन्न पहलुओं को जोड़ें: समुद्री जैवविविधता + GIS और सुदूर संवेदन + तटीय पारितंत्र + संरक्षण प्रशासन + सामुदायिक भागीदारी।
स्रोत: PTI, “CMFRI maps marine mammal stranding hotspots along Indian coast”, 5 नवंबर 2026, The Week में प्रकाशित।; The Week
पंजाब में पराली जलाने के विरुद्ध प्रवर्तन कार्रवाई से फसल अवशेष प्रबंधन और वायु प्रदूषण पर बहस फिर तेज हुई
संक्षेप में: पंजाब में CAQM की प्रवर्तन कार्रवाइयों ने फसल अवशेष जलाने, निगरानी की सीमाओं और किसानों के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्पों पर फिर ध्यान केंद्रित किया है।

समाचार में क्यों
6 नवंबर 2026 को The Indian Express ने पंजाब में फसल अवशेष जलाने के विरुद्ध वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की कार्रवाई पर चर्चा की। आयोग ने नौ जिलों के अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए थे और 12 जिलों के अधिकारियों को प्रवर्तन में चूक के लिए जवाबदेही संबंधी चेतावनी दी थी। रिपोर्ट के अनुसार, फसल अवशेष जलाने पर जुर्माना ₹5,000 से ₹30,000 तक है। इसमें ऐसे अनुसंधान का भी उल्लेख था, जो संकेत देता है कि पराली जलाने की कुछ घटनाएँ देर के समय में होने लगी हैं, जिससे उपग्रह द्वारा उनका पता लगाना कठिन हो सकता है। इन टिप्पणियों से यह स्थापित नहीं होता कि दिल्ली के वायु प्रदूषण का एकमात्र कारण पराली जलाना है।
अवधारणा: फसल अवशेष जलाना और क्षेत्रीय वायु प्रदूषण
फसल अवशेष जलाने का अर्थ खेतों में फसल के बचे हुए हिस्सों को खुले में जलाना है, विशेषकर कटाई के बाद धान के पुआल को जलाना। उत्तर-पश्चिमी भारत में धान की कटाई और गेहूँ की बुआई के बीच कम समय मिलने के कारण अवशेषों को शीघ्र हटाने का दबाव उत्पन्न हो सकता है। इन्हें जलाने से कणीय पदार्थ और अन्य प्रदूषक उत्सर्जित होते हैं, जो क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता की समस्याओं में योगदान देते हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और निकटवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 के अंतर्गत CAQM की स्थापना क्षेत्रभर में वायु प्रदूषण प्रबंधन का समन्वय करने के लिए की गई थी। अवशेष प्रबंधन के उपायों में खेत में ही उन्हें मिट्टी में मिलाना (इन-सीटू) और जैव ऊर्जा तथा औद्योगिक कच्चे माल जैसे उपयोगों के लिए खेत से बाहर एकत्र करना (एक्स-सीटू) शामिल हैं।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रमुख तथ्य
- CAQM: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और निकटवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग।
- वैधानिक आधार: CAQM अधिनियम, 2021।
- धान के पुआल का प्रबंधन इन-सीटू (खेत के भीतर) और एक्स-सीटू (खेत के बाहर) विधियों से किया जा सकता है।
- वायु गुणवत्ता की निगरानी में उपग्रह प्रेक्षण, स्थल पर सत्यापन और परिवेशी वायु प्रदूषण का मापन शामिल हैं।
मुख्य परीक्षा विश्लेषण और आगे की राह
मुख्य परीक्षा विश्लेषण
- कृषि अर्थशास्त्र: किसानों को मशीनों, श्रम, फसल अवशेष हटाने और समय पर बुआई से संबंधित खर्च वहन करने पड़ते हैं।
- पर्यावरणीय प्रभाव: फसल अवशेष जलाना वायु प्रदूषण में योगदान देता है, लेकिन यह उसका एकमात्र स्रोत नहीं है।
- निगरानी की चुनौतियाँ: उपग्रहों के निश्चित प्रेक्षण समय के कारण आग लगने की कुछ घटनाएँ दर्ज होने से छूट सकती हैं।
- नीतिगत समन्वय: स्थायी समाधान के लिए कृषि, पर्यावरण, ऊर्जा क्षेत्रों और राज्य सरकारों के बीच सहयोग आवश्यक है।
आगे की राह
- सहकारी और साझा उपयोग की व्यवस्थाओं से किफायती अवशेष-प्रबंधन मशीनों तक पहुँच बढ़ाएँ।
- कृषि जैवभार के लिए विश्वसनीय संग्रहण नेटवर्क और वाणिज्यिक बाजार विकसित करें।
- सत्यापित प्रवर्तन कार्रवाई को किसानों के लिए सहायता, निगरानी और दीर्घकालीन कृषि विविधीकरण के साथ जोड़ें।
विभिन्न पहलुओं को जोड़ें: वायु प्रदूषण + फसल विविधीकरण + MSP से जुड़े फसल चयन के प्रोत्साहन + सतत कृषि + सहकारी संघवाद।
स्रोत: The Indian Express का संपादकीय, “A new conversation is needed on stubble burning”, 6 नवंबर 2026।; The Indian Express
संक्षेप में
- कोटिया गाँव: ओडिशा-आंध्र प्रदेश सीमा विवाद: विवादित कोटिया क्षेत्र के 800 से अधिक मतदाता 5 नवंबर को स्थानीय निकाय चुनावों में भाग लेने के लिए आंध्र प्रदेश गए। कोटिया ओडिशा के कोरापुट जिले में स्थित है और इस क्षेत्र के कुछ हिस्सों पर दोनों राज्य दावा करते हैं। (The Indian Express, 5 नवंबर 2026)
- जम्मू-कश्मीर के कारागारों की सुरक्षा का आधुनिकीकरण: 5 नवंबर को उपराज्यपाल Manoj Sinha की अध्यक्षता में हुई बैठक में अधिकारियों ने समर्पित कारागार आसूचना इकाइयाँ स्थापित करने और जम्मू-कश्मीर के सभी कारागारों में बायोमेट्रिक प्रणालियों का विस्तार करने पर चर्चा की। इन प्रस्तावों का उद्देश्य आसूचना सूचनाओं का आदान-प्रदान और कारागार सुरक्षा बेहतर बनाना है। (The Indian Express, 6 नवंबर 2026)
- निर्वाचन आयोग ने IT संबंधी निगरानी व्यवस्था बहाल की: निर्वाचन आयोग के एक नए कार्य-आवंटन आदेश ने पुनः पुष्टि की कि महानिदेशक (IT) Seema Khanna की निगरानी वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त Pawan Kumar Sharma के माध्यम से की जाएगी। आयोग ने कहा कि इस निगरानी को हटाने वाला पूर्व आदेश लागू नहीं किया गया था। (The Indian Express, 6 नवंबर 2026)
- Hardeep Singh Puri निर्विरोध राज्यसभा के लिए निर्वाचित: दो अन्य उम्मीदवारों के नामांकन अस्वीकृत होने के बाद केंद्रीय मंत्री Hardeep Singh Puri को 5 नवंबर को मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया। Akashvani News (Akashvani News, 5 नवंबर 2026)
- Amish Shah ने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की सीट जीती: भारतीय-अमेरिकी चिकित्सक Amish Shah ने 3 नवंबर के अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में एरिज़ोना के प्रथम कांग्रेस निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। वह एरिज़ोना से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए निर्वाचित होने वाले पहले भारतीय-अमेरिकी और प्रतिनिधि सभा के लिए निर्वाचित छठे भारतीय-अमेरिकी सदस्य बने। (Associated Press, 5 नवंबर 2026; PTI, The Telegraph, 5 नवंबर 2026)
- अग्निपथ योजना: सेवा में बनाए रखने का संशोधित विकल्प: मंत्रिमंडल ने ऐसे 75% अग्निवीरों के लिए दो वर्ष की अतिरिक्त सेवा का विकल्प स्वीकृत किया, जिन्हें शुरुआत में नियमित सेवा का प्रस्ताव नहीं मिला था। इस अवधि के बाद नियमित भर्ती उनकी इच्छा और चयन मानदंडों को पूरा करने पर निर्भर करेगी। (रक्षा मंत्रालय, PIB, 4 नवंबर 2026)
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास: 5 प्रश्न
उत्तर और व्याख्या देखने के लिए एक विकल्प चुनें। सभी पाँच प्रश्नों के उत्तर देने पर आपका प्राप्तांक दिखाई देगा।
मुख्य परीक्षा अभ्यास
GS II | संविधान | मौलिक अधिकार और आपराधिक न्याय प्रश्न “मनमानी हिरासत के विरुद्ध संवैधानिक गारंटी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगने के क्षण से प्रभावी होनी चाहिए, न कि गिरफ्तारी का औपचारिक अभिलेख तैयार होने के समय से।” भारत में मनमानी हिरासत के विरुद्ध संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपायों का परीक्षण कीजिए। चर्चा कीजिए कि सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय आपराधिक जाँच में न्यायिक निगरानी और जवाबदेही को किस प्रकार सुदृढ़ करता है।
उत्तर की रूपरेखा देखें
भूमिका
अनुच्छेद 21 व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 22 गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के लिए विशिष्ट सुरक्षा उपाय निर्धारित करता है। नवंबर 2026 का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय संवैधानिक समय-सीमा की गणना का प्रारंभ बिंदु औपचारिक गिरफ्तारी के बजाय वास्तविक हिरासत को मानकर इन गारंटियों को सुदृढ़ करता है।
मुख्य भाग 1: संवैधानिक सुरक्षा उपाय
- अनुच्छेद 21 विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है; इसकी व्याख्या में निष्पक्षता, न्याय और युक्तियुक्तता की आवश्यकता को शामिल किया गया है।
- अनुच्छेद 22(1) गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी और विधिक परामर्शदाता की सहायता प्राप्त करने से संबंधित सुरक्षा उपाय प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 22(2) आवश्यक यात्रा समय को छोड़कर, 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने की अपेक्षा करता है।
- अनुच्छेद 22(3) निवारक निरोध सहित कुछ निर्दिष्ट अपवाद प्रदान करता है, जिनके लिए पृथक संवैधानिक सुरक्षा उपाय लागू होते हैं।
मुख्य भाग 2: वैधानिक और न्यायिक संरक्षण
- BNSS, 2023 की धारा 58 न्यायिक प्राधिकार के बिना 24 घंटे से अधिक हिरासत में रखने पर प्रतिबंध लगाती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस समय-सीमा की गणना के लिए हिरासत में लिए जाने का वास्तविक समय प्रासंगिक है।
- मजिस्ट्रेटों को हिरासत संबंधी अभिलेखों की जाँच करनी चाहिए, नियमों के अनुपालन का सत्यापन करना चाहिए और हिरासत की युक्तियुक्तता का आकलन करना चाहिए।
- बिना स्पष्टीकरण के हिरासत में रखने को केवल बाद में औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज कर लेने से वैध नहीं बनाया जा सकता।
मुख्य भाग 3: आपराधिक न्याय के लिए महत्त्व
- अनौपचारिक हिरासत को संवैधानिक जाँच के दायरे से बाहर रखे जाने से रोकता है।
- जाँच संबंधी शक्तियों पर न्यायिक पर्यवेक्षण को सुदृढ़ करता है।
- इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल पुलिस के दस्तावेजों पर निर्भर नहीं रह सकती।
- प्रक्रियात्मक जवाबदेही को बढ़ावा देता है और शक्तियों के मनमाने प्रयोग को हतोत्साहित करता है।
मुख्य भाग 4: अनुपालन सुदृढ़ करने के उपाय
- हिरासत के सटीक और लेखापरीक्षा-योग्य अभिलेख बनाए रखें।
- कानूनी सहायता और मजिस्ट्रेटों तक समय पर पहुँच सुनिश्चित करें।
- गिरफ्तारी की संवैधानिक प्रक्रियाओं के संबंध में पुलिस प्रशिक्षण बेहतर बनाएँ।
- अवैध हिरासत के आरोपों की समीक्षा के लिए प्रभावी तंत्र स्थापित करें।
निष्कर्ष
प्रभावी आपराधिक जाँच और संवैधानिक स्वतंत्रता परस्पर विरोधी उद्देश्य नहीं हैं। न्यायिक पर्यवेक्षण, हिरासत के सटीक अभिलेख और लागू किए जा सकने वाले प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि राज्य की शक्ति का प्रयोग विधि के शासन के अंतर्गत हो।
मुख्य परीक्षा के लिए एक सुझाव
हिरासत में लिए जाने के वास्तविक समय और औपचारिक गिरफ्तारी के रूप में दर्ज समय के बीच अंतर स्पष्ट करें। साथ ही, 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने की अनिवार्यता और उसके बाद मजिस्ट्रेट द्वारा प्राधिकृत हिरासत के बीच भी अंतर करें। यह विधिक सटीकता प्रश्न का केंद्रीय पक्ष है।
CURRENT CANVAS | 6 नवंबर 2026
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